भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुक्रवार का दिन काला साबित हुआ। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग और मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में गहराते युद्ध के तनाव ने भारतीय रुपये की कमर तोड़ दी है। शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 94.85 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर जा गिरा। रामनवमी की छुट्टी के बाद जब बाजार खुला, तो निवेशकों में डर और अनिश्चितता का माहौल साफ दिखा, जिसके चलते रुपये ने एक ही कारोबारी सत्र में 89 पैसे की भारी गिरावट दर्ज की।

रुपये के इस ‘फ्री-फॉल’ के पीछे तीन मुख्य कारण माने जा रहे हैं। पहला, ब्रेंट क्रूड का 110 डॉलर प्रति बैरल के पार निकलना, जिससे भारत का आयात बिल बेकाबू हो गया है। दूसरा, विदेशी निवेशकों (FIIs) द्वारा भारतीय शेयर बाजार से 4,367 करोड़ रुपये की भारी निकासी। और तीसरा, वैश्विक स्तर पर डॉलर इंडेक्स का 99.94 के स्तर पर पहुँचकर शक्तिशाली होना। इस गिरावट का सीधा असर दलाल स्ट्रीट पर भी दिखा, जहाँ सेंसेक्स 1,690 अंक टूटकर धराशायी हो गया।
इस ऐतिहासिक गिरावट का सबसे कड़ा प्रहार आम आदमी की जेब पर होने वाला है। चूंकि भारत अपने इलेक्ट्रॉनिक्स, चिप्स और कलपुर्जों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए डॉलर महंगा होने से मोबाइल, लैपटॉप और अन्य गैजेट्स की कीमतों में 5% से 10% तक की बढ़ोतरी होने की आशंका है। इसके अलावा, कच्चा तेल महंगा होने से आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और परिवहन लागत में इजाफा हो सकता है, जो अंततः खाने-पीने की चीजों को भी महंगा बना देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक युद्ध शांत नहीं होता, रुपये पर दबाव बरकरार रहेगा और अगला मनोवैज्ञानिक स्तर 95.00 हो सकता है।
