मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी का असर अब भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर साफ दिखने लगा है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) द्वारा जारी एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 2.5 रुपये प्रति लीटर की और बढ़ोतरी हो सकती है। गौरतलब है कि देश में पिछले कुछ ही दिनों के भीतर चार किस्तों में तेल के दाम करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ाए जा चुके हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर महंगाई का दबाव तेजी से बढ़ रहा है।

चार बार में ऐसे बढ़े दाम (मई 2026 का रिपोर्ट कार्ड):
15 मई: पहली बार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर का बड़ा इजाफा हुआ।
19 मई: दूसरी बार तेल के दामों में लगभग 90 पैसे की बढ़ोतरी की गई।
23 मई: तीसरी बार पेट्रोल 87 पैसे और डीजल 91 पैसे प्रति लीटर महंगा हुआ।
25 मई: चौथी बार में पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये तक बढ़ा दिया गया।
क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो तेल कंपनियां अपने घाटे को धीरे-धीरे कम करने के लिए कुल बढ़ोतरी को 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुँचा सकती हैं। शुरुआती दो महीनों में कच्चे तेल की औसत कीमत 112 डॉलर प्रति बैरल रही है, जो सरकार और एजेंसियों के अनुमानित 95 डॉलर प्रति बैरल के बजट से काफी ज्यादा है।
महंगाई दर (CPI) पर दिखेगा सीधा असर
ईंधन की कीमतों में हो रही इस बढ़ोतरी का सीधा असर देश की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) यानी खुदरा महंगाई दर पर पड़ेगा। वर्तमान बढ़ोतरी के कारण सीपीआई महंगाई पर 36 बेसिस पॉइंट का सीधा असर पड़ने का अनुमान है। वहीं, यदि तेल कंपनियों द्वारा कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुँच जाती है, तो महंगाई पर यह नकारात्मक असर बढ़कर 48 बेसिस पॉइंट तक हो सकता है।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर सबसे बड़ी मार, बढ़ जाएगी माल ढुलाई
इस तेल संकट का सबसे घातक असर देश के लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर होने वाला है। भारत में लगभग 71 प्रतिशत माल ढुलाई सड़क परिवहन के माध्यम से होती है, और इस सेक्टर के कुल खर्च में अकेले ईंधन (ईंधन लागत) की हिस्सेदारी करीब 42 प्रतिशत होती है। ऐसे में डीजल महंगा होने से सप्लाई चेन पूरी तरह प्रभावित होगी।
इसका सबसे पहला और सीधा असर उन रोजमर्रा की जरूरी चीजों पर पड़ेगा जो पूरी तरह से लॉजिस्टिक्स पर निर्भर हैं, जैसे—डेयरी उत्पाद (दूध-दही), चाय, कॉफी, ताजे फल, दालें, मसाले, अंडे, मांस और मछली।
कोर महंगाई का खतरा: कंपनियां अपना सकती हैं ‘श्रिंकफ्लेशन’
कच्चे तेल, गैस और ट्रांसपोर्टेशन की बढ़ती लागत के चलते कंपनियों पर ‘कोर महंगाई’ (Core Inflation) का दबाव भी बढ़ेगा। कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, लकड़ी, सीमेंट और सिरेमिक जैसे प्रमुख सेक्टरों में उत्पादन लागत बढ़ने से कीमतें बढ़ने की पूरी संभावना है। क्रिसिल का मानना है कि बाजार में मांग स्थिर रखने के लिए कंपनियां या तो सीधे तौर पर एमआरपी (MRP) बढ़ा सकती हैं, या फिर वे ‘श्रिंकफ्लेशन’ (Shrinkflation) की रणनीति अपना सकती हैं—यानी सामान की कीमत तो वही रहेगी, लेकिन पैकेट के अंदर प्रोडक्ट का साइज या वजन कम कर दिया जाएगा।
