वैश्विक ऊर्जा बाजार में उस समय हड़कंप मच गया जब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने कच्चे तेल के शक्तिशाली संगठन ओपेक (OPEC) और ओपेक+ से अपनी दशकों पुरानी सदस्यता खत्म करने का चौंकाने वाला ऐलान कर दिया। ईरान युद्ध के चलते पहले से ही अस्थिर तेल बाजार में यूएई के इस कदम ने ‘आग में घी’ डालने का काम किया है। विशेष रूप से भारत जैसे देशों के लिए यह खबर अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करते हैं।

यूएई का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव के कारण वैश्विक तेल सप्लाई का पांचवां हिस्सा पहले ही बाधित है। ओपेक की पाबंदियों से मुक्त होकर यूएई अब स्वतंत्र रूप से अपना तेल उत्पादन बढ़ा सकेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो लंबे समय से ओपेक को तेल की कीमतें बढ़ाने का दोषी मानते रहे हैं, ने इस फैसले का स्वागत किया है। ट्रंप का तर्क है कि ओपेक जैसे संगठन कृत्रिम रूप से कीमतें बढ़ाकर दुनिया की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाते हैं।
भारत के नजरिए से विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकालिक रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है, जिससे घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। हालांकि, भविष्य में यह भारत के लिए एक बड़ा अवसर भी साबित हो सकता है। ओपेक के कोटे से बाहर होने के बाद यूएई अब भारत जैसे अपने रणनीतिक साझेदारों को अधिक मात्रा में और संभवतः कम कीमतों पर कच्चा तेल उपलब्ध करा सकेगा। भारत सरकार पहले से ही रूस और अन्य विकल्पों के जरिए आपूर्ति सुनिश्चित कर रही है, ऐसे में यूएई का यह स्वतंत्र रुख भारत के लिए ‘सस्ता तेल’ पाने का नया और स्थायी रास्ता खोल सकता है।
