आम आदमी पार्टी (AAP) और कभी अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार रहे राघव चड्ढा के बीच की दूरियां अब पूरी तरह से जगजाहिर हो गई हैं। पिछले कुछ हफ्तों से चल रही कयासबाजियों के बीच बुधवार को दो ऐसी बड़ी घटनाएं हुईं, जो संकेत दे रही हैं कि पार्टी चड्ढा पर अंतिम कार्रवाई की तैयारी कर चुकी है। राज्यसभा में ‘डिप्टी लीडर’ के पद से हटाए जाने के बाद अब राघव चड्ढा की सुरक्षा छीन लेना और उन पर भाजपा के साथ मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाना, इस बात की पुष्टि करते हैं कि ‘आप’ में ‘चड्ढा युग’ अब समाप्ति की ओर है।

पहला बड़ा घटनाक्रम राघव चड्ढा की सुरक्षा को लेकर रहा। पंजाब की ‘आप’ सरकार ने चड्ढा को मिली ‘जेड प्लस’ सुरक्षा वापस ले ली है, जिसे राजनीतिक हलकों में पार्टी से उनके औपचारिक अलगाव का बड़ा संकेत माना जा रहा है। हालांकि, केंद्र सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उन्हें ‘जेड’ कैटेगरी की सुरक्षा मुहैया करा दी है, जिसने इन अटकलों को और हवा दे दी है कि चड्ढा की नजदीकी अब भाजपा नेतृत्व के साथ बढ़ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षा का छिनना और केंद्र द्वारा प्रदान किया जाना, राघव की नई राजनीतिक पहचान की ओर इशारा कर रहा है।
दूसरा और सबसे चौंकाने वाला संकेत पार्टी के भीतर से आए उन बयानों से मिला, जिसमें अशोक कुमार मित्तल के ठिकानों पर हुई ईडी (ED) की छापेमारी का तार राघव चड्ढा से जोड़ दिया गया। ‘आप’ के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा सहित कई नेताओं ने दावा किया कि यह छापेमारी चड्ढा के कहने पर हुई है। पार्टी का आरोप है कि डिप्टी लीडर पद से हटाए जाने से नाराज राघव चड्ढा ने भाजपा के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की थी और उन्हीं के इशारे पर डॉ. मित्तल को निशाना बनाया गया। हालांकि, पार्टी इन कार्रवाईयों के बावजूद एक बड़े तकनीकी नुकसान से डर रही है; यदि राघव को पार्टी से निकाला जाता है, तो उनकी राज्यसभा सदस्यता बरकरार रहेगी, जिससे सदन में पार्टी का संख्याबल कम हो जाएगा। यही वजह है कि स्वाति मालीवाल के मामले की तरह यहाँ भी पार्टी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
