भारतीय संसदीय इतिहास में एक बेहद नाटकीय और चौंकाने वाले घटनाक्रम के तहत, मोदी सरकार द्वारा लाया गया ‘महिला आरक्षण संविधान संशोधन विधेयक’ लोकसभा में पारित होने में विफल रहा। 18 अप्रैल 2026 को संसद के विशेष सत्र के दौरान हुए ऐतिहासिक मत विभाजन में सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में नाकाम रही। सदन की कार्यवाही के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नतीजों की घोषणा करते हुए बताया कि विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 वोट डाले गए। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक विशेष बहुमत (कुल सदस्यों का दो-तिहाई) न मिलने के कारण यह बिल विचार किए जाने के स्तर पर ही गिर गया।

विधेयक के गिरने के तुरंत बाद सदन में भारी हंगामा शुरू हो गया। विपक्षी दलों ने एकजुट होकर सरकार की रणनीतिक विफलता पर सवाल उठाए, जबकि सत्ता पक्ष ने इसे देश की ‘नारी शक्ति’ के साथ विश्वासघात करार दिया। एनडीए के पास वर्तमान में 293 सदस्य हैं, और सरकार को उम्मीद थी कि कुछ निर्दलीय और छोटे दलों के सहयोग से वह 360 के जादुई आंकड़े (विशेष बहुमत) को छू लेगी, लेकिन मतदान के दौरान विपक्ष की एकजुटता ने सरकार के मंसूबों पर पानी फेर दिया। इस हार के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने घोषणा की कि सरकार अब इस मुद्दे से जुड़े अन्य दो प्रस्तावित विधेयकों को आगे नहीं बढ़ाएगी।
इस घटनाक्रम ने 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिला आरक्षण को लागू करने की सरकारी योजना को बड़ा झटका दिया है। राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिल का गिरना सरकार के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और संख्याबल की हार है, जिससे आने वाले दिनों में देश की राजनीति और अधिक गरमाने वाली है। जहाँ भाजपा इसे विपक्ष द्वारा महिलाओं के हक को रोकने की साजिश के रूप में पेश करेगी, वहीं विपक्ष इसे सरकार की अधूरी तैयारी और अहंकार की हार बताएगा। फिलहाल, इस महत्वपूर्ण विधेयक के गिरने से संसद के विशेष सत्र का एजेंडा अधर में लटक गया है और देश भर की महिला संगठनों में इस परिणाम को लेकर निराशा देखी जा रही है।
