रूस-यूक्रेन के बीच सीजफायर की खबरों से अभी राहत मिली ही थी कि मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में अमेरिका और ईरान के बीच भड़की सैन्य जंग ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौती पेश कर दी है। सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की सप्लाई में आई बाधा के कारण भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 15 मई 2026 से पहले भारी बढ़ोतरी की जा सकती है।

इस संभावित महंगाई का सबसे बड़ा कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी को माना जा रहा है, जहाँ से दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस रणनीतिक मार्ग के बंद होने और ईरान-अमेरिका के बीच जारी मिसाइल हमलों ने ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों को 70 डॉलर से उछालकर सीधे 126 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँचा दिया है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात करता है, ऐसे में वैश्विक बाजार में कीमतों का बढ़ना सीधे तौर पर घरेलू बाजार को प्रभावित कर रहा है।
वर्तमान में स्थिति यह है कि तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को हर महीने लगभग 30,000 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है। पिछले चार सालों से सरकार ने आम जनता को राहत देने के लिए कीमतों को स्थिर रखा था, लेकिन अब यह बोझ असहनीय होता जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, सरकार और तेल कंपनियां मिलकर पेट्रोल पर 24 रुपये प्रति लीटर तक का अतिरिक्त बोझ खुद झेल रही हैं। यदि जल्द ही कीमतों में संशोधन नहीं किया गया, तो तेल कंपनियों की आर्थिक स्थिति चरमरा सकती है, जिसके चलते आगामी 15 मई तक ईंधन के दामों में 10 से 20 रुपये तक की वृद्धि की प्रबल संभावना है।
