भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित द्विपक्षीय व्यापार समझौतेको लेकर एक बहुत बड़ा और निर्णायक अपडेट सामने आया है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए अगले 48 घंटे बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर नई दिल्ली में एक हाई-लेवल बैठक करने जा रहे हैं। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के पहले चरणको अंतिम रूप देना और फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को लॉक करना है।

24 जुलाई की ‘ट्रंप डेडलाइन’ से पहले लाभ उठाने की कोशिश
यह उच्च स्तरीय वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वैश्विक आयात पर लगाए गए 10% के अस्थायी अतिरिक्त टैरिफ (शुल्क) की 150 दिनों की समय-सीमा आगामी 24 जुलाई को समाप्त होने जा रही है। इसके बाद अमेरिका एक नया टैरिफ स्ट्रक्चर लागू कर सकता है। भारत और अमेरिका दोनों ही पक्ष इस डेडलाइन से पहले बातचीत पूरी कर टैरिफ लाभ सुनिश्चित करना चाहते हैं। हाल ही में फ्रांस में आयोजित G-7 शिखर सम्मेलन के दौरान भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच व्यापार समझौते को लेकर सकारात्मक चर्चा हुई थी।
अंतिम चरण में बातचीत, मतभेदों को सुलझाने पर जोर
विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अनुसार, भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर बातचीत अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुकी है और पिछले कुछ हफ्तों में दोनों पक्षों के बीच महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने भी संकेत दिया है कि इस बैठक का पूरा फोकस लंबित मुद्दों को सुलझाकर फ्रेमवर्क को फाइनल करने पर रहेगा। इससे पहले जून की शुरुआत में पीयूष गोयल ने उम्मीद जताई थी कि जुलाई के मध्य तक पहले चरण पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं, और यदि यह 24 जुलाई से पहले होता है, तो दोनों देशों के लिए बड़ी कामयाबी होगी।
टैरिफ और बाजार पहुंच (Market Access) पर फंसा है पेंच
दरअसल, पूर्व में हुए एक आकलन के अनुसार भारतीय निर्यात पर 18% टैरिफ की उम्मीद थी, जबकि भारत के प्रतिस्पर्धी देशों पर 19% से 20% तक टैरिफ लगना था, जिससे भारत को बढ़त मिलती। लेकिन वर्तमान में अमेरिका द्वारा सभी देशों पर समान रूप से 10% का एक्स्ट्रा टैरिफ लागू किए जाने के कारण भारत को कोई विशेष लाभ नहीं मिल पा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, भारत इस अंतिम समझौते के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके निर्यातकों को वियतनाम, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में अमेरिकी बाजार में बेहतर और प्राथमिकता के आधार पर पहुंच हासिल हो सके।
