पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 के चुनावी नतीजों ने न केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत दिया है, बल्कि एक गंभीर संवैधानिक गतिरोध भी पैदा कर दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी की हार को स्वीकार करने से इनकार करते हुए ‘इस्तीफा न देने’ का ऐलान कर दिया है। मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग 100 सीटों पर जनादेश की ‘लूट’ हुई है और यह चुनाव परिणाम जनता का नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग और भाजपा की मिलीभगत वाली साजिश का नतीजा है। बनर्जी के इस अड़ियल रुख के बाद अब सबकी नजरें राजभवन और राज्यपाल की शक्तियों पर टिकी हैं।

राज्यपाल के पास क्या हैं विकल्प?
संवैधानिक जानकारों के अनुसार, भारत के संसदीय लोकतंत्र में चुनाव हारने के बाद निवर्तमान मुख्यमंत्री का इस्तीफा एक स्थापित परंपरा है। यदि ममता बनर्जी ऐसा नहीं करती हैं, तो राज्यपाल के पास निम्नलिखित विकल्प मौजूद हैं:
अनुच्छेद 164 का प्रयोग: संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री की नियुक्ति और पदमुक्ति का अधिकार राज्यपाल के पास है। बहुमत खोने या चुनाव हारने के बाद भी पद न छोड़ने की स्थिति में राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर सकते हैं।
7 मई की समय-सीमा: मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को समाप्त हो रहा है। इसके बाद पुरानी विधानसभा स्वतः भंग हो जाएगी, जिससे मुख्यमंत्री का पद कानूनी रूप से प्रभावी नहीं रहेगा।
नई सरकार की नियुक्ति: राज्यपाल बिना इस्तीफे के भी नई विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को सरकार बनाने का न्यौता दे सकते हैं और नए मुख्यमंत्री को शपथ दिला सकते हैं।
अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन): यदि हार के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ती है या नई सरकार के गठन में जानबूझकर अड़चन पैदा की जाती है, तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं।
ममता बनर्जी ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘लोकतंत्र का काला अध्याय’ बताया है और मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं, विशेषकर सोनिया और राहुल गांधी के संपर्क में हैं। अब देखना यह होगा कि 7 मई की समय-सीमा के करीब पहुँचते ही राजभवन क्या कड़ा कदम उठाता है और बंगाल में सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया कैसे पूरी होती है।
