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बिहार में धकियाया लेकिन दिल्ली में स्वागत! कोंग्रेस की बैठक में पप्पु यादव का शामिल होना क्या संकेत देता है?

क्या कांग्रेस आलाकमान ने पटना में पप्पू यादव को गाड़ी में ना चढ़ाकर एक तरह तेजस्वी यादव को खुश कर दिया, वहीं दिल्ली में कांग्रेस की बैठक में पप्पू यादव को बुलाकर उनको भी खुश कर दिया?

बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां कमर कस चुकी है. सभी पार्टियां अपनी तरकस के सभी तीरों की धार को जांचने और परखने में लतगी हुई. ऐसे में दिल्ली में बिहार विधानसभा को लेकर कोंग्रेस ने बैठक का आयोजन किया, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ-साथ राहुल गांधी भी शामिल हुए. इस बैठक में बिहार कांग्रेस के तमाम नेता शामिल हुए. मगर सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसमें पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को भी बुलाया गया. पटना में राहुल गांधी और तेजस्वी की यात्रा के दौरान पप्पू यादव को ट्रक पर न चढ़ने देने के वाकये के बाद कांग्रेस आलाकमान ने जिस ढंग से पप्पू यादव को अहमियत दी है, इशारा साफ है कि कांग्रेस पप्पू यादव को अपने साथ लेकर चलने में यकीन कर रही है.

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पप्पू यादव ने लोकसभा चुनाव से पहले अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया था, मगर कोई कागजी कार्यवाही या कहें औपचारिकताएं पूरी नहीं हो पाई थीं, इसलिए पप्पू यादव पूर्णिया से लोकसभा चुनाव निर्दलीय लड़े. वहां से महागठबंधन की तरफ से आरजेडी ने भी अपना उम्मीदवार उतारा था, मगर जीत पप्पू यादव की हुई.

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बिहार में धकियाया लेकिन दिल्ली में स्वागत

जानकार तो यह भी कहते हैं कि कांग्रेस आलाकमान ने पटना में पप्पू यादव को गाड़ी में ना चढ़ाकर एक तरह तेजस्वी यादव को खुश कर दिया, वहीं दिल्ली में कांग्रेस की बैठक में पप्पू यादव को बुलाकर उनको भी खुश कर दिया. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे से मिलने के बाद पप्पू यादव ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि कांग्रेस में भी मुख्यमंत्री पद के लिए नेताओं की कमी नहीं है. उन्होंने तारिक अनवर और राजेश राम का नाम भी ले लिया.

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पप्पू यादव को अहमियत देकर कांग्रेस क्या इशारा करना चाहती है
कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो पार्टी में पप्पू यादव को लेकर दो राय हैं. बिहार के कुछ नेताओं का कहना है कि पप्पू यादव को अपने बयानों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कुछ ऐसा नहीं कहना चाहिए जिससे महागठबंधन पर असर पड़े. यह सब जानते हैं कि लालू परिवार के साथ पप्पू यादव के रिश्ते अच्छे नहीं हैं. वजह है पूर्णिया का लोकसभा चुनाव, जहां पप्पू यादव निर्दलीय लड़े थे और राजद के उम्मीदवार को हराया था. पप्पू यादव अब कांग्रेस का झंडा उठाकर घूम रहे हैं और राहुल गांधी जय के नारे लगा रहे हैं. दिल्ली की बैठक में कांग्रेस दफ्तर में पप्पू यादव को बुलाकर बड़े नेताओं से मुलाकात करना जरूर कुछ ऐसे इशारे हैं, जिसे राजद नजरअंदाज नहीं कर सकती.

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क्या पप्पू यादव को साथ रखना होगा फायदेमंद?
कांग्रेस में पप्पू यादव के ढेरों सर्मथक भले ना हों, मगर जो भी उनके पक्ष में हैं, उन्हें लगता है कि पप्पू यादव को अपने पाले में रखना कांग्रेस के लिए फायदेमंद रहेगा क्योंकि एक तो वह खुद सांसद हैं. दूसरे उनकी पत्नी कांग्रेस से राज्यसभा की सांसद हैं और एक वक्त में बिहार से ही लोकसभा जीतती थीं.

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कई नेताओं का मानना है कि खासकर सीमांचल में हरेक सीट पर पप्पू यादव के कुछ हजार वोट तो जरूर हैं. सीमांचल में 24 विधानसभा सीट हैं. इसके अलावा मधेपुरा और सहरसा में भी पप्पू यादव के समर्थक हैं. मतलब साफ है, कांग्रेस को महागठबंधन में एक रेफरी की भूमिका निभानी पड़ेगी ताकि सभी नेताओं के बीच एक सामंजस्य हो और गठबंधन एकजुट होकर लड़ें.

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