लोकसभा में राजनीतिक टकराव ने एक बार फिर संसदीय कामकाज को पंगु कर दिया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रस्तावित संबोधन विपक्ष के तीखे विरोध के कारण नहीं हो सका। शाम को जैसे ही कार्यवाही आगे बढ़ी, विपक्षी दलों के सांसद नारेबाजी और तख्तियों के साथ सदन के वेल में पहुंच गए, जिससे माहौल पूरी तरह अव्यवस्थित हो गया।
पीठासीन अधिकारी द्वारा सदन को शांत कराने के तमाम प्रयास नाकाम रहे। शोरगुल इतना तेज था कि सदन में किसी की बात सुनी ही नहीं जा सकी। हालात को देखते हुए लोकसभा की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। इसके साथ ही लगातार तीसरे दिन धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा अधूरी रह गई, जिससे संसद की कार्यक्षमता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

इससे पहले दिन में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सहमति बनाने की कोशिशें भी हुईं। स्पीकर की मौजूदगी में वरिष्ठ मंत्रियों और नेताओं की बैठक हुई, लेकिन गतिरोध टूटने का कोई रास्ता नहीं निकल सका। दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े रहे, जिसका सीधा असर सदन की कार्यवाही पर पड़ा।
इसी बीच संसद परिसर में एक अलग ही सियासी दृश्य देखने को मिला। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच ‘किताबों की राजनीति’ चर्चा का केंद्र बन गई। जहां विपक्षी नेता सैन्य मुद्दों से जुड़ी एक पुस्तक का हवाला देकर सरकार को घेरते नजर आए, वहीं सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने इतिहास और पूर्व सरकारों से जुड़ी किताबों के जरिए जवाबी हमला बोला। यह प्रतीकात्मक टकराव जल्द ही तीखी बहस और शोरशराबे में बदल गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गतिरोध केवल एक दिन की घटना नहीं है, बल्कि संसद के भीतर गहराते अविश्वास और टकराव का संकेत है। यदि संवाद की कोई ठोस पहल नहीं होती, तो आने वाले दिनों में भी संसद का कामकाज प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी।
