बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात ने भारत की व्यापार नीति को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। बजट 2026 से पहले सरकार के सामने चुनौती सिर्फ निर्यात बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसे ढांचे को तैयार करने की है जो अस्थिर वैश्विक माहौल में भी टिकाऊ साबित हो। दुनिया में धीमी आर्थिक रफ्तार, बढ़ते संरक्षणवाद और सप्लाई चेन में बार-बार आ रही रुकावटों ने यह साफ कर दिया है कि अब ट्रेड पॉलिसी केवल आंकड़ों का खेल नहीं रह गई, बल्कि रणनीतिक सोच का विषय बन चुकी है।
बीते कुछ समय में भारत ने यह समझा है कि भविष्य का व्यापार किसी एक बड़े बाजार पर निर्भर नहीं रह सकता। इसी सोच के तहत भारत ने नए साझेदारों के साथ रिश्ते मजबूत करने शुरू किए हैं। एशिया, मिडिल ईस्ट और यूरोप के उभरते और स्थिर बाजारों के साथ समझौतों के जरिए भारत जोखिम को बांटने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इससे न सिर्फ निर्यात के नए रास्ते खुल रहे हैं, बल्कि भारतीय कंपनियों को अलग-अलग रेगुलेटरी सिस्टम में काम करने का अनुभव भी मिल रहा है।

घरेलू मोर्चे पर सरकार मैन्युफैक्चरिंग को व्यापार नीति का आधार बनाने की कोशिश में है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं और आत्मनिर्भर भारत अभियान के जरिए भारत खुद को सिर्फ उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि भरोसेमंद उत्पादन केंद्र के रूप में पेश करना चाहता है। खास तौर पर टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी और हेल्थ सेक्टर में भारत की बढ़ती क्षमता को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
निर्यात के स्वरूप में भी बदलाव नजर आ रहा है। जहां पारंपरिक सेक्टर चुनौतियों से जूझ रहे हैं, वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और डिजिटल सेवाओं ने भारत की वैश्विक पहचान को नया आयाम दिया है। नीति निर्माताओं का मानना है कि अगर इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स और स्किलिंग पर सही निवेश हुआ, तो भारत इन क्षेत्रों में अपनी बढ़त को और मजबूत कर सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार आने वाला बजट भारत की ट्रेड पॉलिसी को ज्यादा लचीला, भरोसेमंद और भविष्य के लिए तैयार बनाने की दिशा तय करेगा। ऐसे समय में जब वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं से घिरा है, भारत की रणनीति उसे एक संतुलित और प्रभावशाली खिलाड़ी के रूप में उभार सकती है।
