राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने संगठन के भीतर चल रही चर्चाओं पर विराम लगाते हुए यह स्पष्ट किया है कि संघ में पद उम्र से नहीं, जिम्मेदारी से तय होते हैं। 75 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद भी संघ प्रमुख के रूप में सक्रिय भूमिका निभा रहे भागवत ने कहा कि आरएसएस में व्यक्तिगत इच्छा से अधिक संगठन की सहमति को महत्व दिया जाता है। उनका कहना था कि जब तक संघ नेतृत्व उनसे कार्य जारी रखने को कहेगा, वे अपनी भूमिका निभाते रहेंगे।

संघ के एक महत्वपूर्ण आयोजन के दौरान उन्होंने यह भी समझाया कि सरसंघचालक का पद किसी चुनाव प्रक्रिया से नहीं जुड़ा होता। यह जिम्मेदारी संगठन की आंतरिक सहमति और वरिष्ठ पदाधिकारियों की सलाह से तय होती है। उन्होंने बताया कि उम्र पूरी होने के बाद उन्होंने स्वयं संगठन को अवगत कराया था, लेकिन संघ ने उनसे अनुभव और मार्गदर्शन के साथ आगे बढ़ने का आग्रह किया।
भाषा और संस्कृति के मुद्दे पर बोलते हुए मोहन भागवत ने यह संकेत दिया कि संघ भारतीय पहचान को प्राथमिकता देता है। उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ी को लेकर विरोध की भावना नहीं है, लेकिन संघ का कार्य और विचार भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही आगे बढ़ेगा। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि वैश्विक संवाद के लिए अंग्रेज़ी पर पकड़ होना आवश्यक है, बशर्ते अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से दूरी न बने।
भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब संगठन के भविष्य नेतृत्व और कार्यशैली को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं। उनके शब्दों ने यह साफ कर दिया कि संघ में पद नहीं, बल्कि सेवा की निरंतरता सबसे बड़ा सिद्धांत है।
