पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर अमेरिका को लेकर तीखे सुर सुनाई देने लगे हैं। नेशनल असेंबली में हालिया बहस के दौरान रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान ने यह संकेत दे दिया कि इस्लामाबाद अब अपने अतीत के रणनीतिक फैसलों पर सार्वजनिक तौर पर आत्ममंथन के मूड में है। उनका बयान केवल मौजूदा हालात तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें चार दशकों से चली आ रही नीतियों और सैन्य-सियासी फैसलों की झलक भी दिखाई दी।
ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान ने अलग-अलग दौर में वैश्विक ताकतों के साथ खड़े होकर अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किया। उन्होंने संकेत दिया कि शीत युद्ध के दौर से लेकर आतंक के खिलाफ जंग तक, पाकिस्तान को ऐसे संघर्षों में झोंक दिया गया जिनका सीधा लाभ देश को नहीं मिला। उनके मुताबिक इन फैसलों का असर केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज, शिक्षा व्यवस्था और आंतरिक स्थिरता पर भी गहरा पड़ा।

रक्षा मंत्री ने यह भी इशारा किया कि पूर्व सैन्य शासकों के दौर में अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने की होड़ में ऐसे कदम उठाए गए, जिनकी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ी। उन्होंने कहा कि उस समय लिए गए फैसलों की वजह से आज भी पाकिस्तान कई मोर्चों पर चुनौतियों से जूझ रहा है। खास तौर पर अफगानिस्तान से जुड़ी नीतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने माना कि इन रणनीतियों ने देश को लंबे समय तक अस्थिरता की ओर धकेला।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बयान केवल अमेरिका की आलोचना नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान के भीतर चल रही उस बहस का हिस्सा है जिसमें देश की विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित करने की मांग तेज हो रही है। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच इस्लामाबाद अब यह सोचने पर मजबूर है कि क्या अतीत की तरह किसी एक महाशक्ति पर निर्भर रहना भविष्य के लिए सही रणनीति होगी या नहीं।
