पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था और आंतरिक अस्थिरता के बीच वहां के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने कूटनीतिक गलियारों में उनकी समझ पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक हालिया इंटरव्यू में बासित ने गीदड़भभकी देते हुए कहा कि यदि अमेरिका पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाता है, तो पाकिस्तान बिना सोचे-समझे भारत के दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों पर हमला कर देगा। बासित का यह तर्क कि ‘अमेरिका हमारी रेंज में नहीं है, इसलिए हम भारत को मारेंगे’, न केवल अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं के खिलाफ है, बल्कि यह पाकिस्तान की उस हताशा को भी दर्शाता है जहाँ वह खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए परमाणु कार्ड का इस्तेमाल कर रहा है।

अब्दुल बासित का यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सीनेट में पेश की गई रिपोर्ट में पाकिस्तान के एडवांस मिसाइल सिस्टम को वैश्विक शांति के लिए खतरा बताया गया है। अमेरिकी दबाव से बौखलाए बासित ने तर्क दिया कि यदि अमेरिका उनके परमाणु ठिकानों पर हमला करता है, तो पाकिस्तान के पास भारत पर हमला करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। यह बयान ‘बगल में छोरा, शहर में ढिंढोरा’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है, जहाँ दुश्मन कोई और है लेकिन निशाना पड़ोसी को बनाने की बात की जा रही है।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो पाकिस्तान की ऐसी धमकियाँ हमेशा खोखली साबित हुई हैं। 1965 से लेकर कारगिल युद्ध तक, भारतीय सेना ने हर बार पाकिस्तान के दुस्साहस का कड़ा जवाब दिया है। 93,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण का इतिहास गवाह है कि युद्ध की भाषा पाकिस्तान के लिए ही आत्मघाती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बासित जैसे पूर्व राजनयिक केवल घरेलू राजनीति में अपनी जगह बनाए रखने के लिए इस तरह के भड़काऊ बयान दे रहे हैं, जबकि हकीकत में पाकिस्तान की सैन्य और आर्थिक स्थिति किसी भी बड़े संघर्ष को झेलने की स्थिति में नहीं है। भारत ने हमेशा ‘नो फर्स्ट यूज’ की नीति का पालन किया है, लेकिन ऐसी धमकियाँ दक्षिण एशिया में अस्थिरता पैदा करने का काम करती हैं।
