लगभग एक वर्ष तक केंद्र के प्रत्यक्ष शासन में रहने के बाद मणिपुर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया ने फिर से रफ्तार पकड़ ली है। राष्ट्रपति शासन हटते ही राज्य को नया नेतृत्व मिल गया और युमनाम खेमचंद ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सत्ता संभाल ली। राजभवन में आयोजित समारोह में राज्यपाल अजय भल्ला ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई, जिसके साथ ही मणिपुर की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई।

युमनाम खेमचंद का नाम ऐसे समय में सामने आया है, जब राज्य लंबे समय से सामाजिक तनाव और प्रशासनिक अस्थिरता से जूझता रहा है। मेतई समुदाय से आने वाले खेमचंद सिंगजामेई विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और इससे पहले बीरेन सिंह सरकार में अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी निभा चुके हैं। प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक पकड़ को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताया है।
बीजेपी विधायक दल की बैठक में उनके नाम पर सहमति बनने के बाद केंद्र नेतृत्व ने राष्ट्रपति शासन समाप्त करने की औपचारिक अधिसूचना जारी की। यह फैसला ऐसे वक्त पर लिया गया, जब राज्य में सामान्य स्थिति बहाल करने और राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही थी। पार्टी सूत्रों के अनुसार, नेतृत्व ऐसा चेहरा चाहता था जो जमीनी राजनीति के साथ-साथ संगठन और प्रशासन दोनों को संतुलित कर सके।

मणिपुर पिछले कुछ वर्षों से जातीय संघर्ष की पीड़ा झेल रहा है। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हुई हिंसा ने राज्य की सामाजिक संरचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। हजारों परिवार विस्थापित हुए और सैकड़ों लोगों की जान गई। इसी पृष्ठभूमि में खेमचंद के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वास बहाली और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की होगी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नई सरकार का पहला फोकस कानून-व्यवस्था, पुनर्वास और समुदायों के बीच संवाद पर रहेगा। विधानसभा में बीजेपी और उसके सहयोगियों की संख्या को देखते हुए सरकार को स्थिर बहुमत हासिल है, लेकिन असली परीक्षा जमीन पर हालात सुधारने की होगी। खेमचंद का नेतृत्व इस लिहाज से अहम माना जा रहा है कि वे टकराव के बजाय समन्वय की राजनीति के लिए पहचाने जाते हैं।
राष्ट्रपति शासन की समाप्ति के साथ ही मणिपुर एक बार फिर निर्वाचित सरकार के भरोसे आगे बढ़ रहा है। अब यह आने वाले महीनों में साफ होगा कि नई सरकार राज्य को शांति और विकास के रास्ते पर कितनी मजबूती से ले जा पाती है।
