मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में गहराते युद्ध के बादलों और इराक-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में हलचल मचा दी है, लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर यह है कि देश में पेट्रोल-डीजल की किल्लत नहीं होगी। भारत सरकार ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए एक बेहद चतुर और बहुआयामी रणनीति अपनाई है। जहाँ एक तरफ होर्मूज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव के कारण सप्लाई चेन प्रभावित होने का खतरा बना हुआ है, वहीं भारत ने रूस से कच्चे तेल के आयात को एक बार फिर से तेज कर दिया है। फरवरी में आई मामूली गिरावट के बाद अब रूसी तेल की खेप 18 लाख बैरल प्रति दिन के आंकड़े को पार कर गई है और विशेषज्ञों का मानना है कि मार्च के अंत तक यह 20 लाख बैरल के पार जा सकती है।

भारत अब केवल पारंपरिक खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय अपने ‘सप्लायर बास्केट’ का विस्तार कर रहा है। इस रणनीति का सबसे चौंकाने वाला और सकारात्मक पहलू दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील का उभार है। ब्राजील अब भारत का चौथा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया है, जो यह दर्शाता है कि भारत भौगोलिक रूप से दूर स्थित देशों से भी अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। पिछले साल जून के पीक के बाद जब फरवरी 2026 में रूस से आयात घटकर 10 लाख बैरल रह गया था, तब इराक और सऊदी अरब ने मोर्चा संभाला था, लेकिन अब युद्ध की स्थिति को देखते हुए रूस एक बार फिर भारत का सबसे भरोसेमंद ऊर्जा साझेदार बनकर उभरा है।
सरकार की इस ‘डायवर्सिफिकेशन पॉलिसी’ का मुख्य उद्देश्य किसी भी एक क्षेत्र में होने वाले भू-राजनीतिक उथल-पुथल के असर को कम करना है। केप्लर (Kpler) जैसे वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि भारत जिस तरह से रूस की रियायती कीमतों और ब्राजील जैसे नए बाजारों के बीच संतुलन बना रहा है, वह भविष्य में घरेलू कीमतों को स्थिर रखने में मददगार साबित होगा। भले ही मिडिल ईस्ट से होने वाला कुल आयात अभी भी 59% के करीब है, लेकिन रूस की वापसी और ब्राजील का बढ़ता दबदबा यह सुनिश्चित करता है कि युद्ध की स्थिति में भी भारत की रफ्तार नहीं थमेगी।
