भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुक्रवार का दिन किसी झटके से कम नहीं रहा, जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अपने ऐतिहासिक निचले स्तर 93.49 पर जा गिरा। बीते एक साल में रुपए की कीमत में आई 10 रुपए (करीब 11%) की यह भारी गिरावट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आपकी रसोई के बजट से लेकर देश की विकास दर तक को प्रभावित करने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव जारी रहा और कच्चा तेल $100 के पार गया, तो रुपया जल्द ही 95 का स्तर भी देख सकता है।

इस गिरावट के पीछे वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों का बड़ा हाथ है। डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने जहां डॉलर को मजबूती दी है, वहीं भारत-अमेरिका ट्रेड डील में देरी और मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने आग में घी डालने का काम किया है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, जिसकी कीमत डॉलर में चुकानी पड़ती है। जब रुपया कमजोर होता है, तो तेल का आयात महंगा हो जाता है, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं और अंततः माल ढुलाई महंगी होने से खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छूने लगते हैं।
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। भारत का मर्चेंडाइज़ ट्रेड डेफिसिट (MTD) पिछले एक साल में लगभग दोगुना होकर USD 27.1 बिलियन पहुंच गया है। विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से इस साल 90 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की निकासी की है, जो बाजार के सेंटीमेंट को कमजोर कर रहा है। हालांकि, इस स्थिति का एक सकारात्मक पक्ष भी है; आईटी और टेक्सटाइल जैसे निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों को डॉलर की मजबूती से फायदा हो सकता है, क्योंकि उन्हें अपनी सेवाओं के बदले अधिक रुपए मिलेंगे। आरबीआई के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ गिरते रुपए को थामने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करना और दूसरी तरफ महंगाई को काबू में रखने के लिए सख्त मौद्रिक नीतियां बनाना।
