अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो सप्ताह के ‘नाजुक’ युद्धविराम के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में धीरे-धीरे हलचल शुरू हो गई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, युद्धविराम के प्रभावी होने के बाद पहली बार किसी गैर-ईरानी जहाज ने इस समुद्री मार्ग को सफलतापूर्वक पार किया है। गैबॉन के झंडे वाला तेल टैंकर ‘MSG’, जो संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से लगभग 7,000 टन फ्यूल ऑयल लेकर भारत के गुजरात स्थित ‘एजिस पीपावाव बंदरगाह’ की ओर बढ़ रहा है, इस रणनीतिक मार्ग से गुजरने वाला पहला अंतरराष्ट्रीय टैंकर बन गया है।

हालांकि, यह आवाजाही इस बात का संकेत है कि होर्मुज स्ट्रेट अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ है। समुद्री निगरानी संस्थाओं और डेटा एनालिटिक्स फर्मों के अनुसार, युद्धविराम की घोषणा के बाद अब तक केवल मुट्ठी भर ईरानी जहाज और छह बल्क कैरियर ही इस मार्ग से गुजर सके हैं। ईरान ने सुरक्षा की गारंटी देने के बदले में यहां से गुजरने वाले जहाजों पर ‘टोल’ वसूलने की अपनी योजना पर काम करना शुरू कर दिया है, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक असंतोष पनप रहा है। ईरान का तर्क है कि वह इन जहाजों को सुरक्षा प्रदान कर रहा है, इसलिए टोल लेना उनका अधिकार है, लेकिन यह कदम आने वाले समय में नए विवादों को जन्म दे सकता है।
वैश्विक तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है, और इस मार्ग के आंशिक रूप से खुलने के बावजूद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं। भारत के लिए यह टैंकर ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही अमेरिका और ईरान के बीच अभी शांति की घोषणा हुई है, लेकिन होर्मुज की स्थिति अभी भी एक ‘बारूद के ढेर’ जैसी है, जहाँ सुरक्षा का हर कदम कूटनीतिक दांव-पेच से जुड़ा है। भारत के पीपावाव बंदरगाह की ओर बढ़ता यह टैंकर उम्मीद की एक किरण तो है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि जब तक यह जलमार्ग पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं हो जाता, तब तक वैश्विक ऊर्जा स्थिरता पर खतरा बरकरार रहेगा।
