वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में एक बार फिर चीन के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बहस तेज हो गई है। हालिया अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चीन कम क्षमता वाले सामरिक परमाणु हथियारों के विकास पर तेजी से काम कर रहा है। इन हथियारों को बड़े शहरों के बजाय सीमित दायरे में प्रभाव डालने के उद्देश्य से तैयार किया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इनका इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर मानवीय और पर्यावरणीय नुकसान पहुंचा सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने जिनेवा में आयोजित निरस्त्रीकरण सम्मेलन के दौरान आरोप लगाया कि चीन ने पिछले वर्षों में भूमिगत परीक्षण गतिविधियों को अंजाम दिया है। हालांकि इन दावों पर बीजिंग ने सख्त आपत्ति जताई है। China का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह रक्षात्मक नीति पर आधारित है और वह हथियारों की होड़ में शामिल नहीं है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कम क्षमता वाले परमाणु हथियारों को ‘टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन’ की श्रेणी में रखा जाता है। इनकी ताकत पारंपरिक रणनीतिक बमों से कम होती है, लेकिन सीमित क्षेत्र में अत्यधिक विनाशकारी प्रभाव डाल सकती है। 1945 में Atomic bombings of Hiroshima and Nagasaki के बाद से परमाणु हथियारों के उपयोग को लेकर वैश्विक समुदाय बेहद सतर्क रहा है।
रिपोर्टों में यह भी आशंका जताई गई है कि 2030 तक चीन अपने परमाणु जखीरे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकता है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। चीन के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधियों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि उनका देश न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता की नीति पर कायम है।
इस बीच अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण से जुड़ी संधियों के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि प्रमुख शक्तियों के बीच पारदर्शिता और संवाद की प्रक्रिया मजबूत नहीं हुई तो वैश्विक हथियार नियंत्रण व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कम क्षमता वाले परमाणु विस्फोट भी गंभीर रेडिएशन, बुनियादी ढांचे के विनाश और दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकते हैं। इसलिए किसी भी तरह की परमाणु प्रतिस्पर्धा वैश्विक स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है।
