अमेरिका ने भारतीय सौर उत्पादों पर बड़ा व्यापारिक कदम उठाते हुए 125.87 प्रतिशत तक का प्रतिपूरक शुल्क लगाने की घोषणा की है। यह कार्रवाई उन आरोपों के बीच की गई है जिनमें कहा गया है कि भारतीय कंपनियों को सरकारी सब्सिडी का अनुचित लाभ मिल रहा है। यह नया शुल्क 24 फरवरी 2026 से प्रभावी 10 प्रतिशत सार्वभौमिक टैरिफ के अतिरिक्त होगा।
अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत के साथ-साथ इंडोनेशिया और लाओस से आयातित क्रिस्टलाइन सिलिकॉन फोटोवोल्टिक सेल पर भी जांच के प्रारंभिक निष्कर्ष जारी किए हैं। अंतिम निर्णय 6 जुलाई 2026 तक आने की संभावना जताई गई है, यदि प्रक्रिया स्थगित नहीं होती। समानांतर रूप से डंपिंग रोधी जांच भी जारी है।

आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका को भारत से सोलर निर्यात में तेज उछाल देखा गया है। 2022 में जहां यह आंकड़ा 8.38 करोड़ डॉलर था, वहीं 2024 में बढ़कर 79.26 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। इसी वृद्धि को अमेरिकी प्रशासन अपने घरेलू उद्योग पर दबाव के रूप में देख रहा है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में घरेलू सौर विनिर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए हैं। देश में मॉड्यूल, पीवी सेल, इन्गोट और वेफर उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना के तहत लगभग 48.3 गीगावाट की एकीकृत सौर विनिर्माण क्षमता के लिए अनुबंध जारी किए जा चुके हैं। इनमें से 26.6 गीगावाट मॉड्यूल और 10.5 गीगावाट सेल क्षमता स्थापित की जा चुकी है।
सरकार की रूफटॉप सोलर योजना और प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान जैसी पहलें स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा दे रही हैं। भारत वर्तमान में वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक देश है। आयात निर्भरता घटाने के लिए अप्रैल 2022 में सोलर सेल और मॉड्यूल पर मूल सीमा शुल्क लगाया गया था।
हाल के आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में भारत का सौर मॉड्यूल आयात घटकर 2.15 अरब डॉलर रह गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 4.35 अरब डॉलर था। चीन से आयात भी कम होकर 1.7 अरब डॉलर तक आ गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह टैरिफ फैसला भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में नया तनाव पैदा कर सकता है, हालांकि दोनों देशों के बीच ऊर्जा और जलवायु सहयोग के क्षेत्र में साझेदारी जारी रहने की संभावना है।
