मिडिल ईस्ट में जारी बारूदी संघर्ष और कूटनीतिक गतिरोध के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बड़ा कदम उठाया है। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता के विफल होने के बाद, पुतिन ने अब खुद दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश की है। शनिवार को इस्लामाबाद में 1979 के बाद पहली बार अमेरिका और ईरान एक मेज पर आए थे, लेकिन अविश्वास की गहरी खाई और होर्मुज स्ट्रेट जैसे मुद्दों पर सहमति न बनने के कारण कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। ऐसे में रूस की एंट्री ने वैश्विक राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है, जो इस तनावपूर्ण क्षेत्र में शांति की उम्मीदों को फिर से जगा सकता है।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से फोन पर विस्तृत चर्चा की। क्रेमलिन के अनुसार, पुतिन ने स्पष्ट किया कि रूस इस क्षेत्र में स्थिरता लाने और बातचीत के जरिए संकट सुलझाने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस के ईरान के साथ मजबूत संबंध हैं और हाल ही में पुतिन की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अलास्का में मुलाकात भी हुई थी। जहाँ ट्रंप लगातार सैन्य कार्रवाई की धमकियाँ दे रहे हैं, वहीं पुतिन खुद को एक ऐसे संतुलित पक्ष के रूप में पेश कर रहे हैं जो तेहरान और वाशिंगटन के बीच पुल का काम कर सकता है।
दूसरी ओर, ईरान अभी भी अमेरिका की नीयत पर शक कर रहा है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबफ ने दोटूक कहा है कि अमेरिका अब तक तेहरान का भरोसा जीतने में विफल रहा है, जो किसी भी टिकाऊ समझौते के लिए सबसे बड़ी बाधा है। इस बीच, इजरायल ने भी स्वीकार किया है कि इस लंबी खिंचती जंग के कारण उसके डिफेंस बजट पर 11.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पुतिन का ‘शांति फॉर्मूला’ ट्रंप की आक्रामक नीतियों और ईरान के अविश्वास को मात देकर मिडिल ईस्ट में शांति की नई इबारत लिख पाएगा।
