एक तरफ पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति की मेज सजी थी, तो दूसरी तरफ समुद्र की लहरों पर बारूद की गंध फैल रही थी। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में शनिवार को उस वक्त युद्ध जैसे हालात बन गए जब अमेरिकी नौसेना के दो शक्तिशाली मिसाइल विध्वंसक जहाजों ने ईरानी चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए विवादित जलक्षेत्र में प्रवेश किया। रेडियो संदेशों के जरिए ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने ‘आखिरी चेतावनी’ देते हुए जहाजों को वापस लौटने या निशाना बनने के लिए तैयार रहने को कहा, लेकिन अमेरिकी जहाजों ने अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देते हुए अपना सफर जारी रखा। यह छह हफ्तों के गतिरोध के बाद पहला मौका था जब अमेरिकी युद्धपोतों ने ईरान के प्रभाव वाले इस समुद्री रास्ते को चुनौती दी है।

दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाले इस रणनीतिक मार्ग को फिर से खोलने के लिए अमेरिका ने अब अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, यूएसएस फ्रैंक ई पीटरसन और यूएसएस माइकल मर्फी केवल गुजर ही नहीं रहे थे, बल्कि वे पानी के भीतर उन्नत ड्रोन तैनात कर ईरान द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंगों (Sea Mines) को ढूंढने और नष्ट करने का अभियान भी चला रहे हैं। एडमिरल ब्रैड कूपर ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका इस महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर ईरान के एकतरफा नियंत्रण को कभी स्वीकार नहीं करेगा और जल्द ही व्यापारिक जहाजों के लिए एक नया ‘सुरक्षित गलियारा’ तैयार किया जाएगा।
दिलचस्प बात यह है कि ईरान इस पूरी घटना को अपनी जीत के तौर पर पेश कर रहा है। ईरानी मीडिया का दावा है कि उनकी सेना ने अमेरिकी जहाजों को पीछे हटने पर मजबूर किया। हालांकि, असली पेच इस्लामाबाद की विफल वार्ता में फंसा है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पुष्टि की है कि ईरान ने अमेरिका के ‘अंतिम और सर्वोत्तम’ प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। दूसरी ओर, ईरान ने वैकल्पिक रास्ते के लिए प्रति जहाज 20 लाख डॉलर का भारी शुल्क वसूलने का प्रस्ताव रखा है, जिसे अमेरिका ने खारिज कर दिया है। कूटनीति के विफल होने और समुद्र में बढ़ते सैन्य टकराव ने अब मिडिल ईस्ट में एक बड़े युद्ध की आशंका को और अधिक गहरा कर दिया है।
